छत्तीसगढ़ के भामाशाह: दानवीर दाऊ कल्याण सिंह अग्रवाल – एक रियासत, जो जनता की अमानत बन गई
दाऊ कल्याण सिंह अलंकरण: समाज सेवा के क्षेत्र में एक नए सम्मान की बाट जोहता छत्तीसगढ़
छत्तीसगढ़ की माटी में दानवीरता की जब भी बात होगी, दाऊ कल्याण सिंह अग्रवाल का नाम सर्वोपरि रहेगा। बिलासपुर जिले के ग्राम तरेंगा में वर्ष 1828 में तहुतदारी प्रथा का उदय हुआ था। इसी तहुतदारी के जन्म के 48 वर्ष बाद, 4 अप्रैल 1876 को दाऊ कल्याण सिंह जी का जन्म हुआ। उनके पिता बिसेसर नाथ तहुतदार थे और माता पार्वती देवी थीं।
संघर्ष और कुशल प्रबंधन
दाऊ जी के पिता ने राजस्व आय बढ़ाने के उद्देश्य से निर्जन स्थानों पर नए गाँव बसाकर अपनी तहुतदारी का विस्तार तो किया, लेकिन इस प्रक्रिया में उन पर कर्ज का बोझ भी बढ़ता गया। वर्ष 1903 में जब पिता की मृत्यु हुई, तब दाऊ जी की आयु मात्र 27 वर्ष थी। युवा कंधों पर कारोबार के साथ-साथ 2 लाख 12 हज़ार रुपये का भारी कर्ज भी आ गया। इस कर्ज के बदले उनकी तरेंगा की पैतृक संपत्ति जबलपुर के सेठ गोकुल दास के पास गिरवी पड़ी थी।
दाऊ जी की प्रारंभिक शिक्षा तरेंगा ग्राम में ही हुई थी, किंतु उनका प्रबंध कौशल किसी बड़े शहर के विशेषज्ञ से भी तेज था। कार्यभार संभालते ही अपनी सूझबूझ से उन्होंने न केवल सारा कर्ज उतारा, बल्कि क्षेत्र का ऐसा विकास किया कि तहुतदारी की वार्षिक आय 3 लाख रुपये तक पहुँच गई। उनके परिश्रम का प्रमाण यह है कि वर्ष 1937 में उन्होंने 70 हज़ार रुपये से अधिक का राजस्व सरकार को चुकाया।

दाऊ कल्याण सिंह अग्रवाल
दानवीरता की मिसाल: रायपुर का आधुनिक स्वरूप
दाऊ केवल धन अर्जन के लिए नहीं, बल्कि उसे प्रेमभाव से जन-कल्याण में लुटाने के लिए प्रसिद्ध हुए। छत्तीसगढ़ के इतिहास में उनके कद का दानी मिलना दुर्लभ है।
- स्वास्थ्य सेवा (DKS Hospital): छत्तीसगढ़ शासन का पूर्व मंत्रालय भवन कभी डी.के. अस्पताल हुआ करता था। सन् 1944 में इसके निर्माण हेतु दाऊ जी ने 1 लाख 25 हजार रुपये दान दिए। उस समय यह आधुनिक चिकित्सा का एकमात्र केंद्र था, जहाँ दूर-दराज से लोग निःशुल्क इलाज के लिए आते थे।
- क्षय रोग (TB) निवारण: रायपुर में 323 एकड़ भूमि उन्होंने क्षयग्रस्त रोगियों के लिए ‘आरोग्यधाम’ बनाने हेतु दान की।
- कृषि विकास: रायपुर के लाभांडी में कृषि कॉलेज और प्रायोगिक फार्म के लिए उन्होंने 1729 एकड़ भूमि और 1 लाख 12 हजार रुपये नगद दिए।
- धार्मिक उदारता: रायपुर की पुरानी बस्ती (टुरीहटरी) स्थित जगन्नाथ मंदिर के लिए उन्होंने ‘खैरा’ नामक पूरा गाँव ही दान में दे दिया था।
प्रदेश और देश हित में योगदान
दाऊ जी की महानता केवल रायपुर तक सीमित नहीं थी:
- अकाल राहत: 1921 के भयंकर अकाल के समय उन्होंने भाटापारा में लाखों की लागत से ‘कल्याण सागर जलाशय’ बनवाया। साथ ही वहाँ मवेशी अस्पताल, धर्मशाला और पुस्तकालय का निर्माण कराया।
- राष्ट्रीय योगदान: नागपुर का लेडी डफरिन अस्पताल और सेंट्रल महिला कॉलेज दाऊ जी के सहयोग के बिना संभव नहीं थे। बिहार का भूकंप हो या वर्धा की बाढ़, हर प्राकृतिक आपदा में उन्होंने अपने कोष का मुँह खोल दिया।
सर्वधर्म समभाव के प्रतीक
यद्यपि दाऊ जी को लोग कट्टर हिंदू मानते थे, लेकिन दान के समय उनके लिए ‘मानव धर्म’ ही सर्वोपरि था। उन्होंने मंदिर, मस्जिद और चर्च—सभी के लिए समान रूप से भूमि उपलब्ध कराई। स्कूल, गौशाला, श्मशान, सड़क और कांजीहाउस जैसे सार्वजनिक कार्यों के लिए उन्होंने न केवल जमीन दी, बल्कि नगद राशि भी भेंट की।
दानवीर दाऊ कल्याण सिंह के नाम पर राज्य अलंकरण की मांग: समय की पुकार
छत्तीसगढ़ की धरती दानवीरों की धरती रही है, और इस सूची में दाऊ कल्याण सिंह अग्रवाल का नाम सबसे स्वर्णिम अक्षरों में अंकित है। जिस महापुरुष ने अपनी रियासत का मोह त्याग कर जनता के स्वास्थ्य और शिक्षा के लिए सर्वस्व अर्पण कर दिया, आज उनकी स्मृति को चिरस्थाई बनाए रखने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार से उनके नाम पर ‘राज्य अलंकरण’ शुरू करने की मांग उठ रही है।
क्यों जरूरी है यह सम्मान?
- निस्वार्थ सेवा का प्रतीक: दाऊ जी ने उस दौर में डी.के.एस. अस्पताल और कृषि महाविद्यालय के लिए करोड़ों की संपत्ति दान की, जब संसाधनों का भारी अभाव था। उनके नाम पर पुरस्कार देने से भावी पीढ़ी में परोपकार की भावना जगेगी।
- इतिहास के प्रति न्याय: छत्तीसगढ़ सरकार विभिन्न क्षेत्रों में विभूतियों के नाम पर सम्मान देती है। स्वास्थ्य और समाज सेवा के क्षेत्र में दाऊ जी का योगदान अतुलनीय है, अतः इस श्रेणी में उनके नाम का अलंकरण होना ही चाहिए।
- सामाजिक प्रेरणा: ‘दानवीर दाऊ कल्याण सिंह राज्य अलंकरण’ उन लोगों को प्रोत्साहित करेगा जो आज के युग में मानवता और समाज कल्याण के लिए निस्वार्थ कार्य कर रहे हैं।
निष्कर्ष
दाऊ जी ने कभी सम्मान की लालसा नहीं की, लेकिन एक कृतज्ञ समाज और सरकार का यह कर्तव्य है कि वह अपने नायकों को उचित सम्मान दे। राज्य सरकार को इस मांग पर गंभीरता से विचार करते हुए, समाज सेवा या चिकित्सा के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वालों के लिए ‘दाऊ कल्याण सिंह राज्य अलंकरण’ की घोषणा करनी चाहिए।
एक विस्मृत नायक
विडंबना यह है कि जिस महापुरुष ने रायपुर का नक्शा बदला और छत्तीसगढ़ को नई पहचान दी, आज हम उन्हें भूल चुके हैं। छत्तीसगढ़ के प्रति उनके अगाध प्रेम के बदले हम उन्हें उनका आधा सम्मान भी नहीं दे पाए। आज मंचों से उनका नाम गुम हो गया है।
दाऊ कल्याण सिंह अग्रवाल जी का जीवन हमें याद दिलाता है कि वास्तविक समृद्धि संग्रह में नहीं, बल्कि ‘समर्पण’ में है। उनके योगदान को विस्मृत करना छत्तीसगढ़ के गौरवशाली इतिहास के एक सुनहरे अध्याय को भूलने जैसा है।





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