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भारत: अफवाहों का मनोविज्ञान और ‘सामूहिक उन्माद’ का संज्ञानात्मक विश्लेषण

अफवाहों का बाज़ार: लॉकडाउन और ईंधन समाप्ति का ‘डिजिटल पैनिक’

भारत में अफवाहें केवल डराती नहीं हैं, बल्कि वे देश की व्यवस्था और अर्थव्यवस्था को भी ठप कर सकती हैं। हाल के समय में लॉकडाउन और पेट्रोल-डीजल की समाप्ति जैसी अफवाहों ने “सामूहिक भय” (Collective Fear) का एक नया और खतरनाक अध्याय लिखा है।सबसे पहले, “फिर से लॉकडाउन लगेगा” जैसी खबरें सोशल मीडिया पर वायरल हुईं। 2020 के लॉकडाउन ने भारतीय जनमानस पर इतना गहरा ‘मनोवैज्ञानिक घाव’ (Trauma) छोड़ा है कि यह शब्द अब एक ‘ट्रिगर’ बन गया है। जब भी किसी नए वायरस वेरिएंट या प्रशासनिक सुगबुगाहट की खबर आती है, तो पुरानी तस्वीरों और फर्जी आदेशों को साझा कर यह दावा किया जाता है कि फिर से सब बंद होने वाला है। इस ‘कैटस्ट्रोफाइजिंग’ (Catastrophizing)—यानी भविष्य की सबसे बुरी स्थिति की कल्पना करने—के कारण प्रवासी मजदूरों में डर, बाजार में सामानों की कालाबाजारी और मानसिक तनाव का स्तर अचानक बढ़ जाता है।

पेट्रोल-डीजल खत्म होने वाला है और पंप बंद हो जाएंगे।” इसे मनोविज्ञान में “Scarcity Heuristic” कहा जाता है। जब मनुष्य को लगता है कि कोई आवश्यक संसाधन खत्म होने वाला है, तो उसका मस्तिष्क तार्किक रूप से सोचना बंद कर देता है और वह ‘संग्रह’ (Hoarding) करने लगता है।परिणामस्वरूप, जिन लोगों को केवल 2 लीटर पेट्रोल की जरूरत थी, वे भी फुल टैंक कराने के लिए लाइनों में लग गए। इस ‘पैनिक बाइंग’ के कारण वास्तव में उन पंपों पर स्टॉक खत्म हो गया जहाँ आपूर्ति सामान्य थी। यह अफवाह की “स्व-पूर्ति की भविष्यवाणी” (Self-fulfilling prophecy) का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जहाँ झूठ वास्तव में सच में बदल गया, लेकिन केवल लोगों के डर के कारण।

भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में सूचनाओं का प्रवाह केवल समाचारों तक सीमित नहीं है। यहाँ ‘लोक-श्रुति’ और ‘जन-चर्चा’ का अपना एक समानांतर तंत्र है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए, तो भारत एक “अफवाह प्रधान” देश के रूप में उभरता है, जहाँ एक छोटी सी चिंगारी पूरे देश की व्यवस्था को झकझोरने की क्षमता रखती है।

पेट्रोल-डीजल शॉर्टेज: एक “स्व-निर्मित” संकट

हाल ही में ईरान अमेरिका इजरायल का युद्ध के चपेट में गल्फ के देश आए साथ में होमुर्ज जल डमरू का रास्ता बंद होने की खबरें आईं, तो सोशल मीडिया पर यह अफवाह फैली कि “देश में तेल का स्टॉक खत्म होने वाला है।”

संज्ञानात्मक प्रभाव: इसे मनोविज्ञान में “Scarcity Heuristic” कहा जाता है। जब लोगों को लगता है कि कोई आवश्यक वस्तु दुर्लभ होने वाली है, तो वे जरूरत से ज्यादा संग्रह करने लगते हैं।

परिणाम: जिस पंप पर 2 दिन का स्टॉक है, वहां लोगों की भारी भीड़ के कारण वह 2 घंटे में खत्म हो जाएगा। यानी कमी तेल की नहीं , कमी ‘धैर्य’ की थी।

संपादकीय टिप्पणी: “सावधानी और धैर्य की कमी ही असली किल्लत पैदा करती है। पैनिक बाइंग (Panic Buying) आपूर्ति श्रृंखला को ध्वस्त करने का सबसे बड़ा कारण है।”

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लॉकडाउन का ‘ट्रॉमा’ और अफवाहें

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2020 के लॉकडाउन ने भारतीय जनमानस पर एक गहरा ‘मनोवैज्ञानिक घाव’ (Trauma) छोड़ा है। अब जब भी कोई नया वायरस या प्रशासनिक बदलाव की सुगबुगाहट होती है, तो “फिर से लॉकडाउन लगेगा” जैसी खबरें वायरल होने लगती हैं।

संपादकीय टिप्पणी: “अतीत का डर भविष्य की कल्पनाओं को भयावह बना देता है। लॉकडाउन की अफवाहें अर्थव्यवस्था और मानसिक स्वास्थ्य दोनों के लिए घातक हैं।”

भारत की चर्चित ऐतिहासिक अफवाहें: मास हिस्टीरिया के उदाहरण

मंकी मैन का आतंक (मई 2001)

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दिल्ली और आसपास के इलाकों में एक ‘अजीब प्राणी’ के दिखने की खबर ने हड़कंप मचा दिया था।

  • दावा: एक काला जीव, जिसके हाथ में लोहे के पंजे हैं और जिसकी आँखें लाल हैं, छतों पर हमला कर रहा है।
  • सच्चाई: पुलिस और वैज्ञानिकों की जांच में कोई जीव नहीं मिला। यह Mass Hysteria का क्लासिक केस था।

संपादकीय टिप्पणी: “मंकी मैन कोई जीव नहीं, बल्कि अंधेरे और असुरक्षा से उपजा एक मानसिक भ्रम था, जिसने पूरी राजधानी को खौफ में डाल दिया था।”

चोटी कटवा कांड (2017)

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राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली में महिलाओं ने दावा किया कि कोई अदृश्य शक्ति उनकी चोटियाँ काट रही है।

  • संज्ञानात्मक विश्लेषण: मनोवैज्ञानिकों ने इसे “Mass Psychogenic Illness” कहा। अक्सर अत्यधिक सामाजिक दबाव या मानसिक तनाव के कारण व्यक्ति अचेतन अवस्था में स्वयं को चोट पहुँचाता है।

संपादकीय टिप्पणी: “चोटी कटवा कांड सामाजिक तनाव और मानसिक स्वास्थ्य के प्रति हमारी अनदेखी का एक विचित्र परिणाम था।”

समाधान: अफवाह मुक्त भारत की ओर

अफवाहों से लड़ने के लिए हमें अपने सोचने के तरीके में बदलाव करना होगा:

  1. सूचना साक्षरता: किसी भी न्यूज़ को फॉरवर्ड करने से पहले “5W+1H” (क्या, कब, कहाँ, किसने, क्यों और कैसे) का सिद्धांत अपनाएं।
  2. तार्किक छानबीन: खुद से पूछें, “क्या तकनीकी रूप से यह संभव है?”
  3. आधिकारिक पुष्टि: केवल सरकारी प्रेस नोट या विश्वसनीय समाचार माध्यमों पर ही भरोसा करें।

निष्कर्ष

मंकी मैन’ से लेकर ‘पेट्रोल शॉर्टेज’ तक, ये सभी घटनाएं एक ही सूत्र से जुड़ी हैं—भय। जब तक हम शिक्षा के साथ-साथ ‘तार्किक चेतना’ का विकास नहीं करेंगे, तब तक हमारा समाज इन मानसिक लहरों का शिकार होता रहेगा। अफवाहों को रोकने का सबसे बड़ा हथियार कानून नहीं, बल्कि एक सजग और जागरूक मस्तिष्क है।

AVINASH MITTAL

अविनाश मित्तल एक अनुभवी स्वतंत्र पत्रकार (Independent Journalist) हैं, जो सामाजिक, स्थानीय और जनहित के मुद्दों पर सक्रिय रूप से लेखन और रिपोर्टिंग करते हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी सक्रियता के साथ-साथ ये सामाजिक गतिविधियों में भी रुचि रखते हैं और क्षेत्रीय मुद्दों को प्रमुखता से उठाते रहे हैं।

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