महासमुंद: पिथौरा क्षेत्र में नियमों को धुआं उड़ा रहे लाल ईंट भट्ठे, उपजाऊ जमीन बंजर और पर्यावरण खतरे में; जाँच की मांग

महासमुंद (विशेष संवाददाता)। क्षेत्र में इन दिनों लाल ईंटों का कारोबार धड़ल्ले से चल रहा है, लेकिन इस कारोबार की आड़ में शासन और राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। पिथौरा विकासखंड के अंतर्गत आने वाले कई गांवों और ‘बया रोड’ के आस-पास संचालित ईंट भट्टे न केवल प्रदूषण फैला रहे हैं, बल्कि स्थानीय प्रशासन की नाक के नीचे अवैध उत्खनन को भी बढ़ावा दे रहे हैं।
इस रिपोर्ट में हम उजागर कर रहे हैं कि किस तरह नियमों को ताक पर रखकर ये भट्ठे संचालित हो रहे हैं और क्यों अब शासन द्वारा इस पर उच्च स्तरीय जाँच की सख्त जरूरत है।
🚨 नियमों की अनदेखी: ग्राउंड रियलिटी
शासन और पर्यावरण संरक्षण मंडल के कड़े नियमों के बावजूद पिथौरा क्षेत्र में जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है:
आबादी और फलदार बगीचों के करीब धधक रही हैं चिमनियां
NGT के नियमानुसार ईंट भट्ठे आबादी क्षेत्र, स्कूल और अस्पतालों से कम से कम 1 किलोमीटर और फलदार बगीचों से 1.6 किलोमीटर दूर होने चाहिए। लेकिन पिथौरा के कई क्षेत्रों में भट्ठे बस्तियों के ठीक बाहरी छोर पर और आम-महुआ के बगीचों के करीब संचालित हैं, जिससे निकलने वाला जहरीला धुआं लोगों के स्वास्थ्य और फसलों को नुकसान पहुंचा रहा है।
‘जिग-जैग’ तकनीक गायब, पुरानी पद्धति से प्रदूषण
छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल (CECB) के स्पष्ट निर्देश हैं कि सभी भट्टों में जिग-जैग (Zig-Zag) तकनीक और हवा को फिल्टर करने वाली ऊंची चिमनियां होनी अनिवार्य हैं। इसके बावजूद, क्षेत्र में अधिकांश भट्ठे आज भी पारंपरिक और अवैध तरीके से बिना उचित चिमनी के चलाए जा रहे हैं, जो हवा में भारी मात्रा में कार्बन और धूल के कण छोड़ रहे हैं।
उपजाऊ कृषि भूमि का अवैध दोहन और बिना डाइवर्शन का खेल
नियमों के मुताबिक कृषि योग्य भूमि पर भट्ठा लगाने के लिए राजस्व विभाग से व्यपवर्तन (Diversion) कराना अनिवार्य है। लेकिन क्षेत्र में कई रसूखदार बिना डाइवर्शन कराए, सीधे खेतों में ही भट्ठा लगा रहे हैं। इससे न केवल शासन को राजस्व की हानि हो रही है, बल्कि मिट्टी की ऊपरी उपजाऊ परत (Top Soil) पूरी तरह नष्ट हो रही है, जिससे आने वाले समय में यह जमीन हमेशा के लिए बंजर हो जाएगी।
खनिज विभाग की अनुमति के बिना अवैध मिट्टी उत्खनन
ईंट बनाने के लिए बड़े पैमाने पर मिट्टी की आवश्यकता होती है, जिसके लिए खनिज साधन विभाग से क्वेरी परमिट (Quarry Permit) और रॉयल्टी पास लेना अनिवार्य है। पिथौरा क्षेत्र के नदी-नालों के किनारों और सरकारी जमीनों से बिना अनुमति के रात-दिन मिट्टी की खुदाई की जा रही है। बिना रॉयल्टी चुकाए ट्रैक्टरों के माध्यम से धड़ल्ले से परिवहन हो रहा है, जिससे सड़कों की हालत भी जर्जर हो रही है।
📋 नियमों और जमीनी हकीकत का तुलनात्मक विश्लेषण
| विषय/मानक | शासकीय नियम व दिशा-निर्देश | पिथौरा क्षेत्र में वर्तमान स्थिति |
| आबादी से दूरी | न्यूनतम 1 किलोमीटर दूर होना अनिवार्य | बस्तियों और मुख्य सड़कों के बिल्कुल नजदीक संचालित |
| प्रदूषण तकनीक | अनिवार्य ‘जिग-जैग’ तकनीक व ऊंची चिमनी | पारंपरिक खुली भट्टियां, मानकों का कोई पालन नहीं |
| भूमि का प्रकार | बंजर/अनुर्वर भूमि + राजस्व विभाग से डायवर्शन | उपजाऊ कृषि भूमि और बिना डायवर्शन के संचालन |
| मिट्टी उत्खनन | खनिज विभाग से परमिट और रॉयल्टी भुगतान | बिना परमिट के अवैध खुदाई और रॉयल्टी की चोरी |
| स्थानीय अनापत्ति | ग्राम पंचायत/स्थानीय निकाय की वैध NOC | बिना वैध कागजात या प्रभाव के दम पर संचालन |
पिथौरा क्षेत्र में ईंट भट्टों पर केवल पर्यावरण और अवैध उत्खनन के नियमों की ही अनदेखी नहीं हो रही है, बल्कि यहाँ काम करने वाले मजदूरों के मानवीय और कानूनी अधिकारों का भी खुलेआम हनन हो रहा है।
👥 विशेष कॉलम: लाल ईंट की भट्टी में सुलगता मजदूरों का हक
जहरीले धुएं और धूल के गुबार के बीच दिन-रात खटने वाले मजदूरों की जिंदगी इस चमकते कारोबार का सबसे काला हिस्सा है। पिथौरा क्षेत्र के भट्टों में काम करने वाले श्रमिकों को न तो न्यूनतम मजदूरी मिल रही है और न ही बुनियादी सुविधाएं। शासन के श्रम नियमों और जमीनी हकीकत का यह अंतर बेहद चौंकाने वाला है:
| श्रम विभाग के कड़े नियम (Labor Laws) | पिथौरा क्षेत्र में जमीनी हकीकत (Ground Reality) |
| न्यूनतम मजदूरी (Minimum Wage): शासन द्वारा तय की गई दैनिक मजदूरी की दर से भुगतान अनिवार्य है। | ठेका और पेशगी का खेल: मजदूरों को प्रति हजार ईंट की घिसाई/थपाई के हिसाब से बेहद कम दाम दिए जाते हैं। अग्रिम राशि (पेशगी) देकर उन्हें सीजन भर के लिए बांध दिया जाता है। |
| कार्य के घंटे (Working Hours): किसी भी श्रमिक से दिन में 8 घंटे से अधिक काम नहीं लिया जा सकता। अतिरिक्त समय का ओवरटाइम मिलना चाहिए। | 12 से 14 घंटे का शोषण: भट्टी की आग को चालू रखने और ईंटें सुखाने के चक्कर में महिलाओं और बच्चों समेत पूरे परिवार से सुबह से देर रात तक काम लिया जाता है। |
| बुनियादी सुविधाएं (Basic Amenities): कार्यस्थल पर साफ पीने का पानी, अस्थाई आवास, शौचालय और प्राथमिक चिकित्सा (First Aid) की व्यवस्था अनिवार्य है। | अमानवीय हालात: मजदूर तपती धूप और प्लास्टिक के तिरपाल की झुग्गियों में रहने को मजबूर हैं। न पीने का साफ पानी है और न ही शौचालय की व्यवस्था। |
| बाल श्रम पर पूर्ण रोक (No Child Labor): 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों से काम कराना कानूनन अपराध है। | बचपन हो रहा स्वाहा: कई भट्टों में छोटे-छोटे बच्चे भी अपने माता-पिता के साथ ईंटें पलटते और ढोते हुए देखे जा सकते हैं, जिससे उनकी शिक्षा पूरी तरह ठप है। |
| अनिवार्य पंजीकरण (Mandatory Registration): हर भट्ठा संचालक को श्रम विभाग में पंजीकृत होना चाहिए और वहां काम करने वाले बाहरी (Inter-State) मजदूरों की सूची विभाग को देनी होती है। | रजिस्टर से नाम गायब: अधिकांश भट्ठा संचालकों के पास मजदूरों का कोई वैध रिकॉर्ड या हाजिरी रजिस्टर नहीं है, ताकि किसी दुर्घटना की स्थिति में वे जिम्मेदारी से बच सकें। |
🏛️ शासन-प्रशासन का ध्यानाकर्षण और जाँच की मांग
स्थानीय नागरिकों और पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि इस विषय में कई बार शिकायत की जा चुकी है, लेकिन स्थानीय अमले की सुस्ती के कारण भट्ठा संचालकों के हौसले बुलंद हैं।
हमारी मांगें और शासन से सवाल:
- खनिज एवं राजस्व विभाग की संयुक्त जाँच: क्या पिथौरा अनुभाग के राजस्व और खनिज अधिकारी इन भट्टों के पास उपलब्ध डाइवर्शन सर्टिफिकेट और क्वेरी परमिट की भौतिक जाँच करेंगे?
- पर्यावरण मंडल की कार्रवाई: बिना ‘Consent to Operate’ (CTO) और जिग-जैग तकनीक के चल रहे भट्टों को तत्काल सील किया जाना चाहिए।
- अवैध उत्खनन पर जुर्माना: सरकारी और कृषि भूमि से बिना रॉयल्टी खोदी गई मिट्टी का आकलन कर संचालकों पर भारी जुर्माना लगाया जाए।
- प्रशासन से सीधी मांग: राजस्व और खनिज विभाग की जाँच के साथ-साथ जिला श्रम पदाधिकारी (DLO) को भी पिथौरा के इन भट्टों का औचक निरीक्षण करना चाहिए। बंधुआ मजदूरी पद्धति (उन्मूलन) अधिनियम और बाल श्रम निषेध कानून के तहत दोषी भट्ठा संचालकों पर तत्काल एफआईआर (FIR) दर्ज होनी चाहिए।
सरकार एक तरफ फ्लाई ऐश (Fly Ash) से बनी ईंटों को बढ़ावा दे रही है ताकि पर्यावरण और उपजाऊ मिट्टी को बचाया जा सके, वहीं पिथौरा में लाल ईंटों का यह अवैध खेल पर्यावरण को गर्त में धकेल रहा है। जिला प्रशासन, महासमुंद कलेक्टर और खनिज विभाग को इस मामले को संज्ञान में लेकर तत्काल एक विशेष जाँच दल (SIT) गठित करनी चाहिए, ताकि नियमों का उल्लंघन करने वाले रसूखदारों पर कड़ी कानूनी कार्रवाई की जा सके।




