घर बैठे PUC सर्टिफिकेट का खेल: नियमों की धज्जियां उड़ाता ‘व्हाट्सएप प्रदूषण जांच’ का नया गोरख धंधा

देश में बढ़ते वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने वाहनों की नियमित जांच और ‘प्रदूषण नियंत्रण प्रमाण पत्र’ (PUC Certificate) को अनिवार्य बनाया हुआ है। केंद्रीय मोटर वाहन नियम, 1989 के तहत बिना वैध पीयूसी के वाहन चलाने पर भारी जुर्माने (₹10,000 तक) और जेल का प्रावधान है। लेकिन जमीनी हकीकत इस कानून और सरकार के दावों का मखौल उड़ा रही है।आजकल बिना गाड़ी को केंद्र पर ले जाए, घर बैठे ही व्हाट्सएप पर पीयूसी प्रमाण पत्र बनाकर दिए जा रहे हैं। परिवहन विभाग की नाक के नीचे चल रहा यह गोरखधंधा न केवल पर्यावरण नियमों को तार-तार कर रहा है, बल्कि सड़क सुरक्षा के लिए भी एक बड़ा खतरा बन चुका है।
कैसे काम करता है यह अवैध खेल?
नियमों के मुताबिक, किसी भी वाहन का पीयूसी सर्टिफिकेट जारी करने के लिए वाहन का अधिकृत पीयूसी सेंटर पर उपस्थित होना अनिवार्य है। वहां गाड़ी के साइलेंसर में प्रोब (जांच पाइप) डालकर धुएं का उत्सर्जन स्तर मापा जाता है। साथ ही, परिवहन विभाग के ‘वाहन’ (VAHAN) पोर्टल पर लाइव कैमरे के जरिए गाड़ी के नंबर प्लेट की फोटो रीयल-टाइम में अपलोड करनी होती है।लेकिन दलालों और भ्रष्ट पीयूसी संचालकों ने इसका भी तोड़ निकाल लिया है:
दलालों का नेटवर्क:
सोशल मीडिया और स्थानीय स्तर पर सक्रिय दलाल ग्राहकों से सीधे संपर्क करते हैं। वे दावा करते हैं कि आपको गाड़ी लाने की कोई जरूरत नहीं है, बस घर बैठे सर्टिफिकेट मिल जाएगा।
व्हाट्सएप पर सौदा:
ग्राहक से गाड़ी का पुराना रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट (RC) या पुराना पीयूसी और गाड़ी के आगे-पीछे की साफ फोटो व्हाट्सएप पर मांगी जाती है।
सिस्टम में हेरफेर:
अधिकृत पीयूसी सेंटर संचालक, जो इस खेल में शामिल हैं, कंप्यूटर स्क्रीन पर मोबाइल से प्राप्त गाड़ी की फोटो को दिखाकर या कैमरे के सामने उस फोटो का प्रिंटआउट रखकर लाइव फोटो की अनिवार्यता को बाईपास कर देते हैं। धुएं की जांच के लिए किसी दूसरी ‘सही’ गाड़ी (अक्सर कोई नई बाइक या सीएनजी कार) का इस्तेमाल कर लिया जाता है।

मिनटों में पीडीएफ:
कुछ ही मिनटों में सरकारी ‘वाहन’ पोर्टल से जनरेटेड डिजिटल पीयूसी सर्टिफिकेट ग्राहक के व्हाट्सएप पर भेज दिया जाता है।
अधिकृत केंद्रों की भूमिका और ‘अतिरिक्त वसूली’ का गणित
हैरानी की बात यह है कि यह पूरा खेल सड़कों पर बैठे किसी फर्जी वेंडर द्वारा नहीं, बल्कि सरकार द्वारा अधिकृत (Authorized) पीयूसी सेंटर्स के माध्यम से खेला जा रहा है। जिन केंद्रों को सरकार ने प्रदूषण रोकने की जिम्मेदारी दी थी, वे ही इस भ्रष्टाचार की मुख्य कड़ी बन गए हैं।정부 (सरकार) द्वारा निर्धारित पीयूसी की फीस बेहद मामूली है (दोपहिया वाहनों के लिए लगभग ₹60-80 और चौपहिया वाहनों के लिए ₹100-150)। लेकिन इस ‘घर बैठे’ सुविधा के नाम पर दलाल और पीयूसी सेंटर संचालक मिलकर ग्राहकों से ₹300 से ₹500 तक की मोटी रकम वसूल रहे हैं। ग्राहक भी आरटीओ के जुर्माने और सेंटर तक जाने के समय को बचाने के चक्कर में इस अतिरिक्त राशि को खुशी-खुशी दे देते हैं।
आलोचनात्मक विश्लेषण : डिजिटल इंडिया में नियमों की विफलता**सरकार का दावा है कि ‘वाहन’ पोर्टल के आने से पूरी प्रक्रिया पारदर्शी हो गई है। लेकिन यह घोटाला दर्शाता है कि तकनीकी सुरक्षा दीवारें भी मानवीय लालच और भ्रष्टाचार के आगे बौनी साबित हो रही हैं।
1. कागजों पर स्वच्छ, हवा में जहर: इस फर्जीवाड़े का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि अत्यधिक धुआं छोड़ने वाले और कंडम हो चुके वाहन भी सड़कों पर ‘वैध’ प्रमाणपत्र लेकर बेधड़क दौड़ रहे हैं। यह सीधे तौर पर आम जनता के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है।
2. आरटीओ और परिवहन विभाग की सुस्ती : सड़कों पर चेकिंग के दौरान पुलिस या आरटीओ केवल यह देखते हैं कि पीयूसी ‘ऑनलाइन’ दिख रहा है या नहीं। चूंकि यह सर्टिफिकेट सरकारी पोर्टल से ही जारी होता है, इसलिए वे भी इसकी वैधता पर शक नहीं करते। विभाग द्वारा इन सेंटर्स का औचक निरीक्षण और डेटा ऑडिट न के बराबर है।
3. सिस्टम की खामी: कैमरे के सामने किसी फोटो का प्रिंटआउट या मोबाइल स्क्रीन रखकर फोटो खींचने की तकनीकी खामी (Loophole) को सॉफ्टवेयर स्तर पर क्यों नहीं रोका गया? एआई (AI) आधारित फेस और ऑब्जेक्ट डिटेक्शन को इसमें शामिल क्यों नहीं किया गया, यह एक बड़ा सवाल है।
निष्कर्ष और सख्त कदम उठाने की जरूरत
‘घर बैठे पीयूसी’ का यह शॉर्टकट देश के पर्यावरण और कानून व्यवस्था को खोखला कर रहा है। सरकार को केवल जुर्माना बढ़ाने पर ध्यान देने के बजाय, इस पूरी व्यवस्था की निगरानी प्रणाली को सुधारना होगा।जब तक ऐसे भ्रष्ट अधिकृत केंद्रों के लाइसेंस स्थायी रूप से रद्द नहीं किए जाएंगे, दलालों पर कानूनी शिकंजा नहीं कसा जाएगा और सॉफ्टवेयर में जियो-फेंसिंग (Geo-fencing) जैसी तकनीकों का इस्तेमाल अनिवार्य नहीं होगा, तब तक प्रदूषण नियंत्रण के सरकारी नियम महज कागजी औपचारिकता बनकर रह जाएंगे। आम जनता को भी यह समझना होगा कि चंद रुपयों और थोड़े से समय की बचत के बदले वे अपने और अपने बच्चों के हिस्से की शुद्ध हवा बेच रहे हैं।

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