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नीति कड़वी, नीयत पर सवाल: प्लास्टिक की बोतलों से पर्यावरण को ‘हैंगओवर’, कबाड़ी से लेकर बर्फ-गोले वालों का धंधा ठप,फाइलों में प्रशासनिक सुधार, जमीन पर ‘आर्थिक नरसंहार’: छत्तीसगढ़ में शराब के लिए प्लास्टिक बोतल के उपयोग का विश्लेषण

न्यूज डेस्क छत्तीसगढ़ – प्रशासनिक सहूलियत और राजस्व सुरक्षा के नाम पर कई बार ऐसे नीतिगत निर्णय ले लिए जाते हैं, जिनका दूरगामी प्रभाव समाज के सबसे निचले तबके और पर्यावरण पर बेहद घातक होता है। छत्तीसगढ़ सरकार का शराब को कांच की जगह प्लास्टिक की बोतलों में देने का हालिया फैसला भी कुछ ऐसा ही है। यह निर्णय न केवल पर्यावरण के मोर्चे पर एक गंभीर चूक है, बल्कि इसने राज्य की एक सुदृढ़, आत्मनिर्भर और गरीब-अनुकूल ‘चक्रीय अर्थव्यवस्था’ (Circular Economy) को भी ध्वस्त करने का काम किया है।

1. कांच की बोतलें और ‘सर्कुलर इकोनॉमी’ का ताना-बाना (जो अब टूट गया)

कांच की बोतलें सिर्फ पैकेजिंग का माध्यम नहीं हैं, बल्कि वे एक पूरी अनौपचारिक अर्थव्यवस्था की रीढ़ रही हैं। कांच पूरी तरह से रीसाइक्लिकल (Recyclable) होता है और इसे अनंत बार बिना गुणवत्ता खोए पुनर्चक्रित किया जा सकता है। इसकी एक पूरी श्रृंखला (Supply Chain) इस प्रकार चलती थी:

  • उत्पादन और बिक्री: निर्माता से शराब कांच की बोतल में बिकने आती है।
  • गरीब और कचरा बीनने वालों (Ragpickers) की आजीविका: शराब की खपत के बाद खाली बोतलें फेंक दी जाती हैं या कबाड़ में दी जाती हैं। झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले गरीब, महिलाएं और बच्चे इन बोतलों को चुनकर अपनी रोज की आजीविका कमाते हैं।
  • कबाड़ी दुकानों का व्यवसाय: ये बोतलें स्थानीय कबाड़ी वालों के पास जाती हैं, जिससे छोटे व्यापारियों का धंधा चलता है।
  • सॉर्टिंग और दोबारा पैकिंग: कबाड़ी वाले इन बोतलों को साफ करते हैं, साइज के हिसाब से छांटते हैं और दोबारा फैक्ट्रियों या रीसाइक्लिंग यूनिट्स में पैक करके भेजते हैं।

1.2 वस्तु विनिमय का ‘गरीब-मॉडल’: जब ‘शीशी’ ही बन जाती है मुद्रा

छत्तीसगढ़ के सुदूर ग्रामीण अंचलों और छोटे कस्बों में एक अनूठी अर्थव्यवस्था चलती है। यहाँ के बर्फ-गोले, चटनी और ‘डबल रोटी’ (पाव) वाले फेरीवाले केवल नकद (Cash) के भरोसे नहीं रहते। उनके धंधे का एक बड़ा हिस्सा ‘वस्तु विनिमय’ पर टिका है।

  • कांच की शीशी: गरीबों की ‘करेंसी’: गाँवों के बच्चे और गरीब तबके के लोग अक्सर घरों के आसपास पड़ी खाली शराब की कांच की शीशियों को इकट्ठा करते हैं। ये खाली बोतलें उनके लिए किसी खजाने से कम नहीं होतीं। जब बर्फ वाला या डबल रोटी वाला फेरीवाला गली से गुजरता है, तो ये बच्चे/लोग खाली कांच की शीशियां देकर बदले में बर्फ का गोला या पाव (डबल रोटी) ले लेते हैं।
  • बच्चे और भूख की तृप्ति: एक छोटे बच्चे के लिए भीषण गर्मी में ठंडी बर्फ या चटपटी चटनी के साथ डबल रोटी का मिलना एक बड़ा सुख है। कांच की शीशियां उनके लिए ‘मुद्रा’ का काम करती हैं, जिससे वे अपनी छोटी-सी भूख मिटा पाते हैं।
  • फेरीवाले की आजीविका का गणित: फेरीवाले इन कांच की शीशियों को शहर या बड़े कबाड़ियों को बेचकर अपना मुनाफा कमाते हैं। यह एक ऐसा चक्र है जहाँ बच्चे को ‘खाने का सामान’ मिल जाता है और फेरीवाले को ‘कबाड़ का मूल्य’।

क्रिटिकल एनालिसिस:

सरकार के प्लास्टिक बोतल वाले फैसले ने इस ‘सामाजिक सुरक्षा चक्र’ को पूरी तरह काट दिया है। अब यदि शराब प्लास्टिक की बोतलों में आएगी, तो कबाड़ खरीदने वाला उसे रद्दी के भाव भी नहीं खरीदेगा।

इसका सीधा परिणाम दो स्तरों पर होगा:

  • बच्चों का नुकसान: अब बच्चों के पास फेरीवाले को देने के लिए कुछ नहीं होगा, जिससे वे उस सस्ते और पारंपरिक नाश्ते (बर्फ-रोटी) से वंचित हो जाएंगे।
  • फेरीवालों की कमाई में भारी गिरावट: फेरीवालों की आय का एक महत्वपूर्ण हिस्सा (जो उन्हें इन खाली बोतलों को बेचकर मिलता था) अब शून्य हो जाएगा। एक छोटी-सी दुकान या फेरी चलाने वाले के लिए कमाई का यह 20-30% हिस्सा बहुत मायने रखता है। यह हिस्सा कटने का मतलब है उनके परिवार के बजट से एक वक्त की रोटी का कम होना।

2. पर्यावरणीय आपदा: प्लास्टिक का बढ़ता अंबार

कांच पर्यावरण के लिए हानिरहित (Inert) होता है। अगर यह मिट्टी में पड़ा भी रहे, तो कोई जहरीला रसायन नहीं छोड़ता। इसके विपरीत, प्लास्टिक (PET) की बोतलें पर्यावरण के लिए एक कभी न खत्म होने वाला अभिशाप हैं।

  • माइक्रोप्लास्टिक का खतरा: छत्तीसगढ़ एक आदिवासी बहुल और समृद्ध वन संपदा वाला राज्य है। जंगलों, नदियों और पिकनिक स्पॉट पर फेंकी गई प्लास्टिक की बोतलें सड़कर माइक्रोप्लास्टिक में बदल जाएंगी, जो अंततः हमारे पानी और भोजन तंत्र में प्रवेश करेंगी।
  • जलभराव और मवेशियों की मौत: प्लास्टिक की बोतलें नालियों को चोक करेंगी, जिससे शहरों में बाढ़ जैसी स्थिति बनेगी। इसके अलावा, लावारिस घूमने वाले मवेशी इन्हें खाकर मौत के मुंह में समाएंगे।
  • रीसाइक्लिंग का ढोंग: भले ही सरकार कहे कि प्लास्टिक रीसायकल होगा, लेकिन हकीकत यह है कि भारत में single-use या हल्की प्लास्टिक का एक बहुत छोटा हिस्सा ही रीसायकल हो पाता है। बाकी सब लैंडफिल (कचरे के पहाड़ों) की शोभा बढ़ाता है।

3. स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव

कांच रासायनिक रूप से निष्क्रिय होता है, इसलिए यह शराब के साथ कोई प्रतिक्रिया नहीं करता। लेकिन प्लास्टिक की बोतलों में जब अल्कोहल को लंबे समय तक रखा जाता है, तो विशेषकर गर्म मौसम (छत्तीसगढ़ की भीषण गर्मी) में प्लास्टिक से Phthalates और Antimony जैसे हानिकारक रसायन शराब में घुल सकते हैं। यह उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य के साथ एक बड़ा खिलवाड़ है, जिससे कैंसर और लिवर की गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।

4. ‘ग्रीन छत्तीसगढ़’ की छवि को धक्का

एक तरफ सरकारें सिंगल-यूज़ प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाने के बड़े-बड़े दावे करती हैं, पर्यावरण संरक्षण के नाम पर अभियान चलाती हैं, और दूसरी तरफ राज्य का आबकारी विभाग खुद हर महीने लाखों-करोड़ों प्लास्टिक की बोतलें पर्यावरण में झोंकने की तैयारी कर रहा है। यह नीतिगत विरोधाभास (Policy Contradiction) दर्शाता है कि निर्णय लेते समय पर्यावरण विशेषज्ञों की पूरी तरह अनदेखी की गई है।

निष्कर्ष एवं सुझाव

सरकार का यह कदम “शॉर्ट-टर्म गेन, लॉन्ग-टर्म पेन” (कम समय का फायदा, लंबे समय का नुकसान) जैसा है। कांच की बोतलों के परिवहन में होने वाले आंशिक नुकसान को बचाने के चक्कर में सरकार ने पर्यावरण की अपूरणीय क्षति और गरीबों की आजीविका पर लात मारने का काम किया है।

इस स्वस्थ इकोनॉमी को ध्वस्त होने से बचाने के लिए सरकार को तुरंत निम्नलिखित कदम उठाने चाहिए:

  1. इस फैसले की समीक्षा की जाए और कांच की बोतलों को वापस लाया जाए।
  2. कांच की बोतलों के लिए ‘बाय-बैक’ (Buy-back) नीति लागू की जाए, जहां खाली बोतल लौटाने पर ग्राहक को कुछ पैसे वापस मिलें, जिससे कबाड़ अर्थव्यवस्था और मजबूत हो।
  3. अगर प्लास्टिक अनिवार्य ही है, तो कंपनियों पर सख्त EPR (Extended Producer Responsibility) लागू हो, ताकि वे अपनी शत-प्रतिशत बोतलें बाजार से वापस उठाने के लिए मजबूर हों।

हमारी टिप्पणी – सरकार अक्सर अपनी फाइलों में आंकड़े देखती है कि कितनी बोतलें बिकीं और कितना टैक्स आया। लेकिन छत्तीसगढ़ की गलियों में कोई यह नहीं देख रहा कि एक खाली शीशी कैसे एक गरीब बच्चे की भूख मिटाती है और कैसे एक फेरीवाले के चूल्हे में आग जलाए रखती है। कांच की बोतलों को हटाना सिर्फ एक व्यावसायिक बदलाव नहीं है, बल्कि यह गाँव की उस ‘अनौपचारिक अर्थव्यवस्था’ पर सर्जिकल स्ट्राइक है, जो बिना किसी सरकारी मदद के सालों से अपनी जीविका खुद तलाश रही थी।”

AVINASH MITTAL

अविनाश मित्तल एक अनुभवी स्वतंत्र पत्रकार (Independent Journalist) हैं, जो सामाजिक, स्थानीय और जनहित के मुद्दों पर सक्रिय रूप से लेखन और रिपोर्टिंग करते हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी सक्रियता के साथ-साथ ये सामाजिक गतिविधियों में भी रुचि रखते हैं और क्षेत्रीय मुद्दों को प्रमुखता से उठाते रहे हैं।

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