15 दिन की सेवा के बाद थम गई नंदी बाबा की सांसें : आंखों के सामने तड़पता रहा गौवंश , मदद की गुहार के बावजूद नहीं मिली लिफ्टर मशीन… आखिर इसका जिम्मेदार कौन ??

रात में जब नंदी बाबा ने खाना-पीना छोड़ा तो गौभक्तों ने तुलसी पत्र और गंगाजल पिलाकर किया सामूहिक नाम-जप, सुबह 10 बजे त्यागे प्राण; नगर पालिका की JCB से नम आंखों के बीच दी गई अंतिम विदाई

पत्थलगांव। सड़क पर घायल अवस्था में मिले नंदी बाबा को बचाने के लिए पिछले करीब 15 दिनों से गौभक्त लगातार सेवा और देखभाल में जुटे थे। हर रात कोई न कोई गौभक्त नंदी बाबा का हाल जानने पहुंचता, उन्हें भोजन-पानी देने और उपचार में मदद करने का प्रयास करता रहा। लेकिन लंबी पीड़ा के बाद आखिरकार नंदी बाबा की सांसें थम गईं।
यह घटना केवल एक पशु की मौत नहीं, बल्कि शहर में बेसहारा और घायल गौवंश की सुरक्षा, उपचार और रेस्क्यू व्यवस्था को लेकर कई गंभीर सवाल छोड़ गई है।
अंतिम रात समझ आ गया था कि अब समय बहुत कम है…

गौभक्तों के अनुसार 29 सितंबर की रात जब वे नंदी बाबा को देखने पहुंचे, तब उनकी हालत बेहद गंभीर थी। उन्होंने खाना-पीना पूरी तरह छोड़ दिया था और अंतिम सांसों की ओर बढ़ रहे थे।
स्थिति देखकर गौभक्तों ने तुलसी पत्र एवं गंगाजल लेकर उन्हें पिलाया और उनके समीप बैठकर सामूहिक रूप से हरे कृष्ण संकीर्तन एवं नाम-जप किया। सेवा कर रहे लोगों के लिए वह रात बेहद भावुक कर देने वाली थी।
गौभक्तों को उम्मीद थी कि शायद नंदी बाबा की पीड़ा कुछ कम हो जाए, लेकिन सुबह करीब 10 बजे उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए।
15 दिन तक हर रात पहुंचते रहे गौभक्त

नंदी बाबा की सेवा में पवन अग्रवाल, अविनाश शर्मा, शिवांश शर्मा, भास्कर शर्मा, ज्ञानेश ओझा, राहुल शर्मा, आदित्य अग्रवाल, आशीष सेन सहित अन्य गौभक्त लगातार जुड़े रहे।
गौभक्तों का कहना है कि उन्होंने नंदी बाबा को बचाने के लिए अलग-अलग स्तर पर मदद की गुहार लगाई, लेकिन तत्काल प्रभावी रेस्क्यू व्यवस्था उपलब्ध नहीं हो सकी।
उनका कहना है कि यदि समय रहते लिफ्टर मशीन जैसी आवश्यक सुविधा उपलब्ध हो जाती तो नंदी बाबा को उठाकर सुरक्षित स्थान पर ले जाना और उपचार कराना संभव हो सकता था। हालांकि, यह भी स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि ऐसी मशीन उपलब्ध होने पर नंदी बाबा की जान निश्चित रूप से बच जाती—यह कहना संभव नहीं है।
ज्ञापन और कागजी प्रक्रिया चलती रही, इधर बढ़ती गई नंदी बाबा की पीड़ा
गौभक्तों का सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब एक घायल और असहाय पशु सड़क पर जिंदगी और मौत से जूझ रहा था, तब तत्काल रेस्क्यू और उपचार की व्यवस्था क्यों नहीं हो सकी?
गौभक्तों के अनुसार, पशु चिकित्सा सुविधाओं, अधिकृत कांजी हाउस, लिफ्टर मशीन और आवारा मवेशियों की सुरक्षा के लिए पहले भी मांगें उठाई गई थीं। लेकिन ज्ञापन और कार्रवाई की प्रक्रिया के बीच नंदी बाबा की हालत लगातार बिगड़ती चली गई।
अब नंदी बाबा की मौत के बाद सवाल फिर सामने खड़ा है—
क्या शहर में किसी घायल गौवंश के लिए तत्काल रेस्क्यू व्यवस्था है?
क्या गंभीर हालत में पड़े पशु को उठाने के लिए लिफ्टर मशीन उपलब्ध है?
क्या आवारा मवेशियों की पहचान और सुरक्षित रखने की पर्याप्त व्यवस्था है?
क्या सड़क पर घायल होने वाले पशुओं के लिए त्वरित चिकित्सा तंत्र मौजूद है?
जिम्मेदार कौन? सवाल कई, जवाब अभी बाकी
नंदी बाबा की मौत के बाद गौभक्तों ने कई संभावित जिम्मेदारियों पर सवाल उठाए हैं—सड़क पर गौवंश को छोड़ने वाले गौपालक, आवारा मवेशियों की व्यवस्था संभालने वाली स्थानीय निकाय व्यवस्था, सड़क दुर्घटना की स्थिति, पशु चिकित्सा सुविधाओं की कमी और शासकीय स्तर पर कार्रवाई में लगने वाला समय।
इन सवालों का वास्तविक उत्तर संबंधित विभागों की जांच और आधिकारिक तथ्य सामने आने के बाद ही तय हो सकेगा। लेकिन इतना जरूर है कि एक असहाय जीव की 15 दिनों तक चली पीड़ा ने व्यवस्था की तैयारियों पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है।
अंतिम विदाई में छलक पड़ीं आंखें

प्राण त्यागने के बाद नंदी बाबा को नगर पालिका की JCB की सहायता से अंतिम विदाई दी गई। जिन गौभक्तों ने 15 दिनों तक उनकी सेवा की थी, उन्हीं हाथों ने अंततः उन्हें नम आंखों से विदा किया।
जिस नंदी बाबा को बचाने के लिए रात-दिन सेवा की गई, उसके जाने के बाद वहां मौजूद गौभक्तों के चेहरे पर एक ही सवाल दिखाई दे रहा था—
“अगर समय रहते व्यवस्था जाग जाती, तो क्या नंदी बाबा की पीड़ा कुछ कम की जा सकती थी?”
नंदी बाबा अब नहीं हैं, लेकिन उनकी मौत कई सवाल छोड़ गई है।
एक नंदी बाबा की विदाई के साथ अब जरूरत सिर्फ शोक मनाने की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाने की है कि अगली बार कोई घायल गौवंश सड़क पर तड़पता मिले तो उसे बचाने के लिए गौभक्तों को दर-दर भटकना न पड़े।
गौसेवा केवल भावना नहीं—आपातकालीन व्यवस्था भी जरूरी
गौभक्तों ने मांग की है कि नगर में लिफ्टर मशीन, प्रभावी कांजी हाउस, पशुओं के गले में रेडियम पट्टी, पर्याप्त चारा-पानी और 24 घंटे उपलब्ध पशु चिकित्सा/रेस्क्यू व्यवस्था सुनिश्चित की जाए, ताकि भविष्य में किसी और नंदी बाबा को ऐसी पीड़ा से न गुजरना पड़े।




