विस्फोटक खुलासा: नोटबंदी ने कैसे तोड़ी नक्सलियों की ‘आर्थिक रीढ़’? पूर्व नक्सली नेता भूपति ने उगले राज
बड़ा खुलासा: नोटबंदी ने तोड़ी नक्सलियों की कमर! नक्सली संगठन के पूर्व पोलित ब्यूरो सदस्य 'भूपति' ने पहली बार अंदर की सच्चाई स्वीकार की है। 2016 की नोटबंदी केवल एक नीति नहीं, बल्कि लाल आतंक की आर्थिक नस पर सीधा वार था।

भारत में साल 2016 की नोटबंदी (Demonetization) को लेकर अक्सर राजनीतिक बहस होती रही है, लेकिन अब नक्सली संगठन के एक पूर्व शीर्ष नेता ने जो खुलासा किया है, वह चौंकाने वाला है। प्रतिबंधित संगठन के पूर्व पोलित ब्यूरो सदस्य भुपति ने एक निजी चैनल को दिए इंटरव्यू में पहली बार आधिकारिक रूप से स्वीकार किया है कि नोटबंदी ने ‘लाल आतंक’ की कमर तोड़ दी थी।
कौन है भूपति
करोड़ का इनामी नक्सली रहा है भूपतिस्वतंत्रता सेनानी के पोते से लेकर माओवादी संगठन की सबसे ताकतवर इकाई ‘पोलित ब्यूरो’ के सदस्य तक का सफर तय करने वाला भूपति उर्फ वेणुगोपाल उर्फ सोनू दादा कभी नक्सलियों का सबसे बड़ा ‘दिमाग’ माना जाता था. करीब तीन दशक तक घने जंगलों में खौफ का पर्याय रहे इस 6 करोड़ के इनामी कमांडर का एक दौर में ऐसा रसूख था कि उसके एक इशारे पर पूरे भारत का नक्सली नेटवर्क हिल जाता था. अपनी तेजतर्रार रणनीतियों और संगठन में गहरा पैठ रखने वाले भूपति का कभी भारतीय सेना में जाने का सपना था, लेकिन किस्मत ने उसे विद्रोह की राह पर धकेल दिया.वही ‘सोनू दादा’ 15 अक्टूबर 2025 को गढ़चिरौली में अपनी AK-47 सौंपकर मुख्यधारा में लौटा आया है.
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करोड़ों का फंड बना ‘रद्दी का कागज
भूपति के अनुसार, 2016 में जब 500 और 1000 रुपये के नोट बंद हुए, तो नक्सली संगठनों के पास जंगलों में छिपाकर रखा गया ₹25 से ₹30 करोड़ का कैश रातों-रात बेकार हो गया।
- जंगलों में डंप पैसा: नक्सलियों ने लेवी (वसूली) के माध्यम से जमा की गई भारी रकम को सुरक्षित ठिकानों और जमीन के नीचे दबाकर रखा था। अचानक हुई घोषणा के कारण उन्हें इस पैसे को ठिकाने लगाने या बदलने का मौका ही नहीं मिला।
- लॉजिस्टिक्स और सप्लाई चेन ठप: इस आर्थिक चोट का सीधा असर उनकी रसद आपूर्ति, हथियारों की खरीद और नए कैडरों की भर्ती पर पड़ा।
आर्थिक नस पर सबसे बड़ा प्रहार
सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहली बार है जब संगठन के भीतर के किसी उच्च पदस्थ व्यक्ति ने इतनी बड़ी आर्थिक तबाही की पुष्टि की है।
नोटबंदी का नक्सलियों पर प्रभाव
- कैश की किल्लत: नक्सलियों का पूरा तंत्र नकद लेनदेन पर टिका होता है। पुराने नोट बंद होने से उनका दैनिक खर्च चलाना मुश्किल हो गया।
- नेटवर्क में बिखराव: फंड की कमी के कारण कई निचले स्तर के कैडरों ने संगठन का साथ छोड़ दिया या आत्मसमर्पण कर दिया।
- हथियारों की खरीद पर रोक: विदेशी और स्थानीय स्रोतों से हथियारों की तस्करी के लिए इस्तेमाल होने वाला ‘ब्लैक मनी’ पूरी तरह फ्रीज हो गया।
- शहरी नेटवर्क का पर्दाफाश: नोट बदलने की कोशिश में नक्सलियों के कई सफेदपोश मददगार (Urban Supporters) जांच एजेंसियों की रडार पर आ गए।
निष्कर्ष: बंदूक से ज्यादा प्रभावी रहा ‘आर्थिक प्रहार’
भूपति का यह खुलासा यह साबित करता है कि नक्सलवाद जैसी आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए केवल बंदूक और सैन्य बल ही काफी नहीं है, बल्कि उनकी फंडिंग पाइपलाइन को काटना भी उतना ही जरूरी है। नोटबंदी ने जंगलों में छिपे उस पैसे को कागज बना दिया, जिसका इस्तेमाल देश विरोधी गतिविधियों के लिए होना था।
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