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आरबीआई जल्द शुरू करेगा प्लास्टिक नोटों का ट्रायल, 2027 तक फुल-स्केल लॉन्च की तैयारी; जारी किया ग्लोबल टेंडर

ई दिल्ली: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) देश में करेंसी के एक नए युग की शुरुआत करने जा रहा है। आरबीआई जल्द ही प्लास्टिक यानी पॉलीमर से बने नोटों का पहला पायलट प्रोजेक्ट शुरू करने की तैयारी में है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह देश की मुद्रा प्रणाली को आधुनिक और अधिक सुरक्षित बनाने की दिशा में आरबीआई का एक बड़ा कदम है।

इस महत्वाकांक्षी योजना के लिए रिजर्व बैंक की नोट-प्रिंटिंग यूनिट ने वैश्विक स्तर पर ‘एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट’ (EOI) जारी कर दिया है। यह ग्लोबल टेंडर एक विशेष प्रकार की ‘पॉलीमर सबस्ट्रेट शीट’ के निर्माण और आपूर्ति के लिए मंगाया गया है, जिसका उपयोग इन नोटों की छपाई के लिए किया जाता है। टेंडर के तहत दुनिया भर के निर्माताओं से एडवांस सिक्योरिटी फीचर्स से लैस शीट के लिए प्रस्ताव मांगे गए हैं और बोलियां जमा करने की अंतिम तारीख 18 अगस्त तय की गई है।

₹10 और ₹20 के नोटों से होगी शुरुआत आरबीआई शुरुआती चरण में सबसे पहले छोटी वैल्यू के नोटों पर इसकी टेस्टिंग करेगा। आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक, पहला पायलट प्रोजेक्ट ₹10 और ₹20 के नोटों के साथ शुरू होगा। इस ट्रायल से मिलने वाले अनुभवों और नतीजों के आधार पर ही आगे का फैसला लिया जाएगा। यदि यह टेस्टिंग पूरी तरह सफल रहती है, तो आरबीआई साल 2027 से देश भर में पॉलीमर नोटों का फुल-स्केल लॉन्च शुरू कर सकता है।

बाजार में एक साथ चलेंगे नए और पुराने नोट प्लास्टिक नोट आने का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि मौजूदा कागजी नोट बंद हो जाएंगे। आरबीआई ने स्पष्ट किया है कि नई करेंसी पुराने पेपर नोटों को तुरंत रिप्लेस नहीं करेगी, बल्कि दोनों का सह-अस्तित्व (Co-existence) बना रहेगा। बाजार में पॉलीमर और पेपर, दोनों ही तरह के नोट एक साथ चलते रहेंगे और यह बदलाव बेहद धीमी और चरणबद्ध (Phased) प्रक्रिया के तहत किया जाएगा। जब तक नए नोट पूरी तरह चलन में नहीं आ जाते, तब तक पुराने कागजी नोट सर्कुलेशन में बने रहेंगे।

1. छोटे नोटों से ही ट्रायल क्यों?

आरबीआई ने ₹10 और ₹20 के नोटों को ट्रायल के लिए इसलिए चुना है क्योंकि भारतीय बाजार में लो-वैल्यू करेंसी (कम कीमत के नोट) का सर्कुलेशन और रोटेशन सबसे ज्यादा होता है।

  • सब्जी बाजार, बस-ऑटो के किराये और रोजमर्रा की दुकानों पर ये नोट सबसे ज्यादा हाथों-हाथ घूमते हैं।
  • इन नोटों पर सबसे ज्यादा धूल, पानी और पसीना लगता है, जिससे ये जल्दी फटते हैं या मैले हो जाते हैं।
  • अगर प्लास्टिक नोट इस कठिन परीक्षा में सफल रहे, तभी आरबीआई बड़े नोटों (जैसे ₹100, ₹200, ₹500) की तरफ बढ़ेगा।

2. क्या है ‘एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट’ (EOI) और 18 अगस्त की डेडलाइन?

नोट छापने वाली आरबीआई की सब्सिडियरी इकाई (जैसे BRBNMPL) ने जो EOI जारी किया है, वह दरअसल दुनिया भर की उन चुनिंदा कंपनियों को न्योता है जो पॉलीमर शीट बनाने में महारत रखती हैं। आरबीआई केवल प्लास्टिक नहीं खरीद रहा, बल्कि ऐसी प्लास्टिक शीट मांग रहा है जिस पर भारतीय सुरक्षा मानकों के अनुसार स्याही टिक सके, जो भारत की अत्यधिक गर्मी (45°C से अधिक) में पिघले नहीं, और जिसमें उन्नत सुरक्षा धागे और अदृश्य फीचर्स इनबिल्ट हों। 18 अगस्त 2026 तक दुनिया भर से आने वाले प्रस्तावों की जांच के बाद टेंडर फाइनल किया जाएगा।

3. ‘को-एग्जिस्टेंस’ नीति: आम जनता को घबराने की जरूरत क्यों नहीं?

साल 2016 की नोटबंदी के विपरीत, इस बार आम जनता को अपनी जेब में रखे नोटों को बदलने के लिए बैंकों के बाहर कतारों में नहीं लगना पड़ेगा।

  • फेज्ड रिप्लेसमेंट: जब बैंक में पुराने कागजी नोट जमा होंगे, तो आरबीआई उन्हें बाजार में वापस भेजने के बजाय नष्ट कर देगा और उनकी जगह नए प्लास्टिक नोट जारी करेगा।
  • यह बदलाव इतना धीमा होगा कि बाजार को पता भी नहीं चलेगा और धीरे-धीरे कागजी नोटों की संख्या कम होती जाएगी।

4. वैश्विक अनुभव: भारत से पहले कौन से देश अपना चुके हैं?

  • ऑस्ट्रेलिया: साल 1988 में पॉलीमर नोट जारी करने वाला दुनिया का पहला देश बना था। आज वहां पूरी तरह प्लास्टिक करेंसी ही चलती है।
  • यूनाइटेड किंगडम (UK): बैंक ऑफ इंग्लैंड ने साल 2016 से चरणबद्ध तरीके से प्लास्टिक पाउंड (£) लॉन्च किए थे, जो अब वहां पूरी तरह स्थापित हैं।
  • इसके अलावा कनाडा, न्यूजीलैंड, वियतनाम, मॉरीशस और रोमानिया जैसे देश अपने कागजी नोटों को पूरी तरह विदाई दे चुके हैं।

न फटेंगे, न पानी में गलेंगे; जालसाजी पर लगेगी लगाम पॉलीमर बैंकनोट पारंपरिक कागजी नोटों की तुलना में काफी ज्यादा टिकाऊ और सुरक्षित होते हैं। ये नोट कागज के बजाय एक खास किस्म के प्लास्टिक मटेरियल (पॉलीमर सबस्ट्रेट) पर छापे जाते हैं।

  • बेहतर लाइफ: यह पानी, गंदगी और धूल से सुरक्षित रहते हैं और भीगने पर भी नहीं गलते। आसानी से न फटने के कारण ये लंबे समय तक साफ-सुथरे बने रहते हैं।
  • मजबूत सुरक्षा: पॉलीमर शीट का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसमें एडवांस सेफ्टी फीचर्स को आसानी से इंटीग्रेट किया जा सकता है। इससे नकली नोट बनाने वाले जालसाजों के लिए इनकी नकल करना लगभग नामुमकिन हो जाएगा, जिससे देश का फाइनेंशियल सेफ्टी सिस्टम और मजबूत होगा।
विशेषतावर्तमान नोट (कागजी/कॉटन)नए नोट (प्लास्टिक/पॉलीमर)
मूल सामग्री (Substrate)यह 100% कॉटन पल्प (रूई के रेशों) से बने होते हैं।यह ‘प्यूरिफाइड पॉलीप्रोपाइलीन’ (BOPP) नामक प्लास्टिक फिल्म की परतों से बनते हैं।
जीवनकाल (Durability)औसत उम्र 1 से 2 साल (छोटे नोट जल्दी खराब होते हैं)।कागजी नोटों की तुलना में 3 से 5 गुना अधिक लंबा जीवनकाल।
पर्यावरणीय प्रभावनमी, पानी, पसीने और धूल से गल जाते हैं; मुड़ने पर फट जाते हैं।पूरी तरह वॉटरप्रूफ और डस्टप्रूफ। आसानी से मुड़ने पर भी नहीं फटते।
सुरक्षा और जालसाजीसुरक्षा फीचर्स अच्छे हैं, लेकिन समय के साथ जालसाज इनकी नकल तैयार कर लेते हैं।इसमें पारदर्शी विंडो (Transparent Windows) और होलोग्राफिक फीचर्स होते हैं, जिनकी नकल करना असंभव है।
स्वच्छता (Hygiene)कागज के रेशे बैक्टीरिया, वायरस और गंदगी को सोख लेते हैं।इनकी गैर-छिद्रपूर्ण (Non-porous) सतह पर गंदगी और कीटाणु नहीं चिपकते।
रीसाइक्लिंगखराब होने पर इन्हें नष्ट कर लैंडफिल या खाद में डालना पड़ता है।पूरी तरह रीसायकल योग्य। पुराने नोटों से प्लास्टिक के दाने बनाकर अन्य उत्पाद बनते हैं।

निष्कर्ष: भारत के लिए यह क्यों जरूरी है?

आरबीआई हर साल हजारों करोड़ रुपये सिर्फ पुराने और फटे-मैले नोटों को नष्ट करने और उनकी जगह नए नोट छापने में खर्च करता है। प्लास्टिक नोट आने से शुरुआत में छपाई की लागत (Printing Cost) जरूर थोड़ी ज्यादा होगी, लेकिन इनका जीवनकाल 4 गुना ज्यादा होने के कारण लंबे समय में देश के सैकड़ों-करोड़ों रुपये की बचत होगी। साथ ही, यह देश की अर्थव्यवस्था को नकली नोटों (जाली मुद्रा) के खतरे से हमेशा के लिए सुरक्षित कर देगा।

AVINASH MITTAL

अविनाश मित्तल एक अनुभवी स्वतंत्र पत्रकार (Independent Journalist) हैं, जो सामाजिक, स्थानीय और जनहित के मुद्दों पर सक्रिय रूप से लेखन और रिपोर्टिंग करते हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी सक्रियता के साथ-साथ ये सामाजिक गतिविधियों में भी रुचि रखते हैं और क्षेत्रीय मुद्दों को प्रमुखता से उठाते रहे हैं।

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